Saturday, 5 March 2016

* तारणहार परमात्मा धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना करते हैं**



** तारणहार परमात्मा धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना करते हैं**

॥ जय जय श्री राधे कृष्ण.. ॥

कुछ भी करना उचित या अनुचित, अच्छा या बुरा नहीं.. इतना ही नहीं बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है परमात्मा की ओर से हर मनुष्य को कि वह कुछ भी करे.. ।

मन, बुद्धि, विवेक देकर साथ में हमें पूर्ण आजादी भी दे रखी है ईश्वर ने, खुदा ने, ममतामयी और न्यायपूर्ण अस्तित्व ने कि हम पूर्णरूपेण कर्त्ता और परिणाम भोक्ता हैं।

इसीलिए तो परमात्मा ने हमें इतना सुयोग्य, सचेतन बनाया। और सुसंस्कृत भी करता रहता हर काल में शरीर धर धर के, अवतीर्ण हो हो कर, गुरु, संत, पैगम्बर के रूप में.. धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना कर कर के।

धर्म, संस्कृति की पुनर्स्थापना का उदेश्य है उस काल और भविष्य में आने वाली मनुष्यता को सचेत करना, समझाना और सुपथ पर लाना और बोध देना कि मनुष्य को अपनी बुद्धि और विवेक से जीवनपथ में बार बार यह सुनिश्चित करते रहना चाहिए कि उसे क्या फल चाहिए और कौन कौन कर्म करे तथा  कौन कौन कर्म न करे, जिनके फल उसके फलेच्छा के अनुकूल हों।

धर्म, संस्कृति की पुनर्स्थापना में परमात्मा इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि मनष्यों को तर्कों, तथ्यों, तुकों, कथा-साहित्यों, परा-अपरा अभिव्यक्तियों और प्रत्यक्षीकरणों के द्वारा इस बात, तथ्य, ज्ञान से भी संस्कृत करना है कि वे इच्छा किस फल, किन फलों की करें।

और भी महत्वपूर्ण बात परमात्मा के सामने यह रहती है  धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना में, अपने आत्मवत मनुष्यों के कल्याण के लिए कि पद्धतियाँ, विधियां, रीतियाँ और नीतियाँ जो रूढ़िगत हो गयीं हैं, जिनमें ज्ञानाग्नि  का अवशेष  रह गया है, भभूत्तिकृत हो गयीं हैं जो, सिर्फ कर्म-काण्डिय रह गयीं हैं जो, औपचारिक मात्र हो क्र रह गयीं हैं जो--उनकी वैज्ञानिकता और ज्ञान के पक्ष को उजागर करें, उनकी उपयोगिताओं पर समसामयिक प्रकाश डालें तथा उनके रूपों में भी समसामयिक, आयश्यक नवीकरण करें। इस नवीकरण में मौलिक तथ्यों, तत्वों में कोई बदलाव नहीं होता, क्योंकि यह सम्भव भी नहीं, लेकिन व्यवहारिक, प्रायोगिक उपयुक्त रूपांतरण स्थान, काल और युग के लिए अत्यंतावश्यक हैं।

यह काल जिसमें पृथ्वी के एक ही वायुमंडल में सांसें लेने वाले हम सभी परमात्मा के बनाये पूतलें हैं। पिछले पचास वर्षों में कई संदेशवाहक, पैगम्बर सदृश्य परमात्मा के अवतरण हुए.... ओशो,  जे. कृष्णमूर्ति, आनंदमूर्ति..... जो अत्यंत कार्य किये, ज्ञान और शांति तथा सुव्यवस्था की स्थापना के लिए।

सारी पृथ्वी पर प्रेम, ज्ञान, ध्यान, शांति के पैगामों को पहुँचाई इन पैगम्बरों ने, परमात्मा के अवतारों ने, लेकिन धृष्टराष्ट्र की भी तो, दुर्योधन और सारे कौरवों की भी तो अपनी मर्यादाएं हैं न....!  भला उनकी स्थूल बुद्धियों को सूक्ष्म, कोमल, प्रेमपूर्ण, रसयुक्त संदेशों और आग्रहों का कोई स्पर्श हो भी तो कैसे हो और यह बात कोई नयी भी नहीं,  लेकिन एक बात अवश्य विचारणीय है कि जीसस क्राइस्ट के समय से अब तक ऐसे अव्वतारों, पैहम्बरों को जघन्य अपराधियों के तरह ही सताया गया है, दण्डित किया गया है परमप्रेम के इन अवतारों को!!

अब समय आ गया है तारणहार के अवतरण का, क्योंकि सच्चे धर्मों को निःवस्त्र करने  के प्रयास बहुत बार हो चुके है पिछले दो हजार वर्षों में, पांडव वनवास और अज्ञातवास को बहुत जी चुके हैं, नीति, धर्म का पालन करने वालों की त्रासदियां अब तारणहार के बर्दाश्त के बाहर हो गयीं हैं!!!

अब तो तारणहार का आना अवश्यम्भावी है,
निश्चय जान,
सम्भवामि युगे युगे!!!

॥ जय जय श्री राधे कृष्ण.. ॥